चुँहिया🐀 का स्वयंवर
गंगा नदी के तट पर एक धर्मशाला थी। वहां एक गुरु जी रहा करते थे। वह दिनभर तप और ध्यान में लीन होकर अपना जीवन यापन करते थे। एक दिन जब गुरु जी नदी में नहा रहे थे, उसी समय एक बाज अपने पंजे में एक चुहिया लेकर उड़ा जा रहा था। जब बाज गुरु जी के ऊपर से निकला तो, चुहिया अचानक बाज के पंजे से फिसलकर गुरु जी की अंजुली में आकर गिर गई। गुरु जी ने सोचा कि अगर उन्होंने चुहिया को ऐसे ही छोड़ दिया, तो बाज उसे खा जाएगा। इसलिए, उन्होंने चुहिया को अकेला नहीं छोड़ा और उसे पास के बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया और खुद को शुद्ध करने के लिए फिर से नहाने के लिए नदी में चले गए। नहाने के बाद गुरु जी ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके चुहिया को एक छोटी लड़की में बदल दिया और अपने साथ आश्रम ले गए। गुरु जी ने आश्रम पहुंचकर सारी बात अपनी पत्नी को बताई और कहा कि हमारी कोई संतान नहीं है, इसलिए इसे ईश्वर का वरदान समझ कर स्वीकार करो और इसका अच्छे से लालन-पालन करो। फिर उस लड़की ने स्वयं गुरु जी की देखरेख में...